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Allama Iqbal Shayari

Allama Iqbal Shayari: Today we have brought for you some selected shayari of Urdu and Hindi poet Allama Iqbal, which you will definitely like.

Allama Iqbal Shayari

Best Allama Iqbal Shayari

Allama Iqbal Shayari

दीप ऐसे बुझे फिर जले ही नहीं
ज़ख्म इतने मिले फिर सिले भी नहीं
व्यर्थ किस्मत पे रोने से क्या फायदा
सोच लेना कि हम तुम मिले भी नहीं।

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के “इम्तिहाँ” और भी हैं
तही ”ज़िंदगी” से नहीं ये फ़ज़ाएँ
यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं.!

जो किए ही नहीं कभी मैंने,
वो भी वादे निभा रहा हूँ मैं.
मुझसे फिर बात कर रही है वो,
फिर से बातों मे आ रहा हूँ मैं !

“कहीं पर जग लिए तुम बिन, कहीं पर सो लिए तुम
बिन. भरी महफिल में भी अक्सर, अकेले हो लिए तुम
बिन ये पिछले चंद वर्षों की कमाई साथ है अपने कभी
तो हंस लिए तुम बिन, कभी तो रो लिए तुम बिन.”

तिरे इश्क़ की ”इंतिहा” चाहता हूँ
मिरी ”सादगी” देख क्या चाहता हूँ
ये जन्नत “मुबारक” रहे ज़ाहिदों को
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ ।

जानते हो तुम भी फिर भी ”अजनान” बनते हो
इस तरह हमें “परेशान” करते हो.
पूछते हो तुम्हे किया पसंद है
जवाब खुद हो फिर भी “सवाल” करते हो..

जलाम-ए-बहर में खो कर सँभल जा
तड़प जा पेच खा खा कर बदल जा
नहीं साहिल तिरी किस्मत में ऐ मौज
उभर कर जिस तरफ चाहे निकल जा.. ।

तेरे इश्क़ की इन्तहा चाहता हूँ
मेरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बे-अदब हूँ , सज़ा चाहता हूँ..!

ये कफन, ये क़ब्र, ये जनाज़े रस्म ए
शरीयत है इकबाल मार तो इंसान तब
ही जाता है जब याद करने वाला कोई
ना हो..!

मुझ सा कोई शख्स नादान भी न हो.
करे जो इश्क़ कहता है नुकसान भी न हो.

चिंगारी आजादी की ‘सुलगती’ मेरे जश्न में है।
इंकलाब की ज्वालाएं लिपटी मेरे बदन में है।
मौत जहां जन्नत हो यह बात मेरे वतन में है।
कुर्बानी का जज्बा “जिंदा” मेरे कफन में है।

तिरे इश्क़ की “इंतिहा ” चाहता हूँ
मिरी “सादगी” देख क्या चाहता हूँ
ये जन्नत “मुबारक” रहे ज़ाहिदों को
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ.!

अल्लामा इकबाल की गजल

मकानी हूँ कि आज़ाद-ए-मकां हूँ,
जहां में हूँ कि खुद सारा जहां हूँ,
वो अपनी ला-मकानी में रहे मस्त,
मुझे इतना बता दें मैं कहां हूँ.

तिरे सीने में दम है दिल नहीं है,
तिरा दम गर्मी-ए-महफ़िल नहीं है,
गुज़र जा अक़्ल से आगे ये नूर,
चराग-ए-राह है मंज़िल नहीं है!

सौ सौ उमीदें बँधती है इक इक निगाह पर
मुझ को न ऐसे प्यार से देखा करे कोई.!

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा..!

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है,
फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है!

Imran Pratapgarhi Shayari >>


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